Thursday, June 3, 2010

कल्पनाओं की उडान...


पंछी सा उड़ सकूँ
कह सकूँ हवा से
नदिया सा बह सकूँ
बातें करूँ फिजा से
तारों सा चमक सकूँ
सूरज सा दमक सकूँ
पवन पर सैर करूँ
मछली सा तैर सकूँ
फिर सोचा, इतने सारे
इतने सारे अरमान हैं
दिल ये बोला,
बहुत कम हैं बहुत कम हैं
ये तो तेरी कल्पनाओं की उडान है

Wednesday, May 26, 2010

तेरी राहें...


उन राहों पे जाना गवारा नहीं
जिन राहों पे ठिकाना तुम्हारा नहीं
लोग रहते हैं अदद वहां भी मगर
पर किसी से भी अपना याराना नहीं
मन को मनाया बहुत और सताया बहुत
और न माना तो हमने डराया बहुत
पर दिल यूं तडपा और बोला
बस अब जाना दुबारा नहीं
उन राहों पे...
जिन राहों पे...

मेरे अहसास .....

कैसे छुपाएँ किसको बताएं
इस जिंदगी में कितने राज़ हैं...
बेसुद हल जाने कितने सवाल
पर हर पल तुझे पाने की आस है...
दिल मसरूफ सितम भी खूब
फिर भी तेरे होने का अहसास है...
शुष्क साँसें करकस आबाज़
जिस्म तन्हां रूह में भी प्यास है...
मुश्किल रह हर कदम पर आह
लेकिन तेरा भरोसा तो मेरे पास है...

Wednesday, May 12, 2010

मेरे अहसास....

नज़रों को झुकाके,
इज़हार मत करना
कभी तू मुझसे,
प्यार मत करना
मैं तो दरिया हूँ,
निकल जाऊंगा
कभी तू मुझपे,
एतबार मत करना..!



ऐ ज़िन्दगी बे-मुरब्बत,
ये कैसा सवाल रक्खा
वहां खुशियाँ बदहाल रक्खीं,
यहाँ गम को बहाल रक्खा..!


उन किस्तियों को कभी,
किनारा नहीं मिलता
जिन किस्तियों को,
मंजिले गवारा नहीं होतीं..!


गर मेरी दुआओं में असर होता,
तो मेरा तेरे दिल में रहगुजर होता
पाटती न दुनियां कभी इश्क की देहरी,
गर मजनू की आशिकी में थोडा और असर होता..!

उस दिन......

उस दिन....
उस दिन मैंने सूरज पे भी,
चाँद का नशा छाते देखा था
मैंने दिन को भी,
साँझ पहलू में जाते देखा था
जब बरसीं थी,
वो बारिश की पहली बूंदे
और उस छोटी सी बदली में,
तुझे नहाते देखा था
उस दिन....
उस दिन मैंने सूरज पे भी,
चाँद का नशा छाते देखा था
मैंने दिन को भी,
साँझ पहलू में जाते देखा था
वो तेरे बालों की लचक,
और दबे होंटों की हंसी
कुदरत को भी तुझपे,
अपना नूर बहते देखा था
उस दिन....
उस दिन मैंने सूरज पे भी,
चाँद का नशा छाते देखा था
मैंने दिन को भी,
साँझ पहलू में जाते देखा था
जाने कितने अरमां उठे थे दिल में,
जाने कितनी अंगड़ाइया लेकर
और जाने कितने चाहने वालों को,
अपने अरमां दबाते देखा था
उस दिन....
उस दिन मैंने सूरज पे भी,
चाँद का नशा छाते देखा था
मैंने दिन को भी,
साँझ पहलू में जाते देखा था
जब बरसीं थी,
वो बारिश की पहली बूंदे
और उस छोटी सी बदली में,
तुम्हे नहाते देखा था....!

Tuesday, April 13, 2010

आइना....


पूछा जो आइने से,
तो कुछ न बोला आइना...
देखा जो आइने में,
तो हुआ खुद से सामना...
सामना क्या था,
नजरों में गिर गए...
खुली किताब थी,
पन्ने बिखर गए...
देखा तो अँधेरा था,
और कुछ न था मुझ में...
झाँका जो गिरेबां में,
खली खडा था मैं...

Wednesday, April 7, 2010

दिख सावन सुखो जाए रे....


दिख सावन सुखो जाए रे
जियरा कछु न भए रे
बस बैठ किनारे नदियन के
मोहे याद तिहारी आए रे
सुन टेक झरोखा खोलत हूँ
सब पूछत कछु न बोलत हूँ
मोरी प्यासी काया रे प्यासों तन
को अधरन की प्यास बुझाए रे
दिख सावन सुखो जाए रे........
चित यौवन झलकत गगरी सो
मन तरसत देखो सबरी सो
पल पलक न झपकत रतियन मे
और न बिछोनन पे सिलबट आए रे
दिख सावन सुखो जाए रे......