
दिख सावन सुखो जाए रे
जियरा कछु न भए रे
बस बैठ किनारे नदियन के
मोहे याद तिहारी आए रे
सुन टेक झरोखा खोलत हूँ
सब पूछत कछु न बोलत हूँ
मोरी प्यासी काया रे प्यासों तन
को अधरन की प्यास बुझाए रे
दिख सावन सुखो जाए रे........
चित यौवन झलकत गगरी सो
मन तरसत देखो सबरी सो
पल पलक न झपकत रतियन मे
और न बिछोनन पे सिलबट आए रे
दिख सावन सुखो जाए रे......
इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
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