पूछा जो आइने से, तो कुछ न बोला आइना... देखा जो आइने में, तो हुआ खुद से सामना... सामना क्या था, नजरों में गिर गए... खुली किताब थी, पन्ने बिखर गए... देखा तो अँधेरा था, और कुछ न था मुझ में... झाँका जो गिरेबां में, खली खडा था मैं...
दिख सावन सुखो जाए रे जियरा कछु न भए रे बस बैठ किनारे नदियन के मोहे याद तिहारी आए रे सुन टेक झरोखा खोलत हूँ सब पूछत कछु न बोलत हूँ मोरी प्यासी काया रे प्यासों तन को अधरन की प्यास बुझाए रे दिख सावन सुखो जाए रे........ चित यौवन झलकत गगरी सो मन तरसत देखो सबरी सो पल पलक न झपकत रतियन मे और न बिछोनन पे सिलबट आए रे दिख सावन सुखो जाए रे......