
ये सफ़र जाने क्यूँ ,
इम्तिहान चाहता है...
ये रिश्ता भी नया,
एक नाम चाहता है...
बैठे हैं साहिल पे,
यूं ही तन्हा...
फिर भी लहर का कतरा,
उससे मेरी पहचान चाहता है...
डूबा जाने कितनी मर्तबा,
गहराइयों मैं उसकी...
पर ये मेरी गर्दिशी समझो,
अनजान चाहता है...
बोल लवों से कुछ भी,
कहता नहीं है...
पर दूर खड़ा रह मुझसे,
बस मिलने का अरमान चाहता है...
ये सफ़र जाने.........
ये रिश्ता जाने.........
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